Monday, April 6, 2015

My Choice or My Voice

महिला सशक्तिकरण ?, sex की आजादी या बराबरी का अधिकार 



किरण शेखावत 

                                                                            लेफ्टिनेंट   किरण शेखावत छोकर   सिर्फ ससुराल ही  नहीं  पुरे मेवात की अब पहचान हैं | आनर किलिंग के लिए बदनाम हरियाणा में इस आदर से पुरुष प्रधान समाज में एक महिला का नाम आते ही पुरुषों के होंठ भी बंद हो जातें है , जिस गाँव  को लोग जानते भी नहीं थे उस  कुर्थला   गाँव की पहचान अब   किरण शेखावत   के नाम से है | 
                                                                                                                                                                                


                                                           
ये बड़े मुद्दे जिनसे नारी वास्तव में सशक्त होगी 
 Woman Empowerment    के  लिए इस से ससक्त उदहारण कोई हो नहीं सकता | तो सवाल यहीं से खड़ा होता है की क्या भारत में नारी सशक्तिकरण का मतलब सिर्फ सेक्सुअलिटी से जुदा है?  क्या  इस से आगे उनकी स्वतंत्रता का कोई निहितार्थ नहीं है? क्या सिर्फ सेक्स की स्वतंत्रता और उस से जुड़े मुद्दों पर महिलाओं की आजादी देकर क्या पुरुष वर्ग समाज के मूल निहितार्थ तथा सामाजिक सरोकारों के सभी दायित्वों को निभाए ,अगर ऐसा होगा तो क्या यह देश कभी सशक्त होगा ?     जवाब है नहीं, क्योकि महिला सशक्तिकरण के नाम पर जिन मुद्दों को लोग अपने स्वार्थ सीधी के लिए उठा रहें हैं वह उनकी वास्तविक आजादी में सिर्फ 1 प्रतिशत का योगदान रखती हैं| वास्तव में   दीपिका पादुकोण   और   होमी  इन दोनों ने     woman empowerment     में से सिर्फ उन्ही विषयों को चुना है जो वास्तव में उनके व्यवसाय से जुड़े हैं, तथा ये मुद्दे जितना ज्यादा उछलेंगे उतनी ही प्रसिधी तथा उनका बाजारीकरण होगा और इस बाजारीकरण के अपने इसी आईडिया से आज   दीपिका पादुकोण   बॉलीवुड की टॉप अभिनेत्रियों में शुमार हैं जहाँ पुरुषों में यह ताज   आमिर खान   के नाम सजता है| 
                                                                                 
वो चेहरे जो भारतीय राजनीती की दसा दिसा तय करती हैं |
 
 भारत में हमेशा से आदर्श चुनने के ज्ञान का टोटा रहा है, और सबसे ज्यादा पशोपेश में युवा वर्ग रहता है, इसी का फायदा देश में ग्लैमर, बॉलीवुड और राजनितिक क्षेत्र के लोग उठाते रहें हैं| इस देश में महिला सशक्तिकरण के प्रतिमान जिन महिलाओ ने स्थापित किये वह उनका प्रचार और व्यापर नहीं कर पाए इस लिए वह आज हमारे देश के महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती लेकिन कुछ लोग उनके मुद्दों को भुनाकर प्रचार भी कर रहें हैं और व्यापर भी और बॉलीवुड किसी भी मुद्दे का बाजारीकरण करने में महारथ रखता है| और इसी दुखती रग को बॉलीवुड परख चूका है की भारत ही ऐसा बाजार है जहाँ लोग रोजमर्रा से जुडी चीजों से लेकर जीवन के आयाम को अपनाते हुआ सिर्फ      packing    (बाहरी आवरण)  को महत्व देते हैं|  न की मूल तत्व  को, जिस देश में युवा सलमान को तो लाखो की संख्या में जन्मदिन की बधाई भेजता है, लेकिन   गाँधी    के उपदेश                        गाँधी जयंती         को हि भुला देता है, ऐसे देश में आदर्शों की नहीं चकाचोंध की कीमत लगाई जाती है| और उस खांचे में दीपिका पादुकोण बिलकुल फिट बैठती हैं | 


इरोम शर्मीला 
 
                                                                                                                                                तो सवाल यहीं से खड़ा होता हैं की   महिला सशक्तिकरण    का मुद्दा परदे पर उकरने की कला तो बॉलीवुड बखूबी जानता है|  लेकिन 100 वर्षों के इतिहास में कोई  सरोजिनी   या  इंदिरा,  मदर टेरेसा , या फिर  किरण शेखावत  ,हजारों ऐसे नाम जो अब हमारे बिच नहीं हैं | तथा कुछ ऐसे नाम जो हमारे बिच हैं |   ललिता गुप्ते  (आईसीआईसीआई बैंक की पूर्व जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर ),  इंदिरा नुई  (पेप्सी ), मेधा पाटकर ,   अरुणा रॉय,   इरोम शर्मीला, सोनिया गाँधी ,    किरण बेदी ,  बनकर महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को सचमुच सजीव करने के लिए खड़ा नहीं हुआ बॉलीवुड ने भारत के हर संवेदनशील मुद्दे का सिर्फ बाजारीकरण किआ है| वर्तमान में दीपिका पादुकोण का पुरजोर समर्थन कर रहे ऋषि कपूर की पीढियों ने वास्तव में महिलाओ को एक वस्तु के रूप में पेश किआ जिस से राजकपूर को    the great showman   का ख़िताब दिलवाया और वर्तमान में करीना कपूर गाने में महिलाओ को तंदूरी मुर्गी बताती हैं, तो यही सोच महिलाओं के सशक्तिकरण में सबसे बड़ी बाधा है 
दबंग 2 में करीना कपूर  गाना - फविकोल से 
                                                                                                                                           तो युवाओ आज आपको चुनना होगा की आप   इरोम शर्मीला   या   किरण शेखावत   को अपना आदर्श मानती  हैं या फिर दीपिका पादुकोण,     नंदिता दास    (जिनको हर भारतीय पुरुष रेपिस्ट दीखता है ) या  सनी लियोन,   को
                                                                                                                                                       कहीं न कही सामाजिक बन्धनों का सवाल है तो भारतीय सभ्यता में महिला और पुरुषो को बराबर अधिकार मिले हैं| हाँ अपनी पुरुषवादी सोच के कारण इस में पुरुषों ने अपनी सीमाओं का उलंघन किया है| और इसे सुधारने की दिशा में पहल किया जाना चाहिए न की उसी राह पर चलकर उनके किये गए कार्यो को हम पुरुषो की सशक्तिकरण का नाम देने दें, तब न तो उन्हें पछतावा होगा न ही हम उन्हें गलत कहने के अधिकारी होंगे,  तो सवाल महिलाओं को ही पूछना होगा की क्या सेक्सुअलिटी की आजादी से ही हमे वास्तविक अधिकार मिल जायेंगे ?

Sunday, April 5, 2015

अंग्रेजो का बुखार कब उतरेगा सरकार

रंगवाद   Vs  "My Choice"

                                                                                                                                                                                                                                                   
                                                                                    गिरिराज सिंह  माननीय मंत्री जी .........के कहे गए कुछ शब्दों ने कुछ लोगो को गहरे तक झकझोर कर रख दिया है | जिसमे गोरे और काले जिसे रंगभेद या नए शब्दों में रंगवाद कह सकते हैं | की परिभाषा गढ़ने का काम किआ इसमें माननीय मंत्री जी की कोई गलती नहीं है | दरअसल वर्षो तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े-जकड़े कहीं न कहीं हमारी मानसिकता तक को अंग्रेजियत ने गुलाम बना रखा है| इसलिए भारतीय भी गोरी चमड़ी के पीछे कुछ ज्यादा ही भागने लगे हैं| विशेषकर यूरोपीय गोरी चमड़ी के पीछे पर इसे भारतीय सोच का नाम नहीं दिया जाना चाहिए | माननीय मंत्री गिरिराज सिंह ने जो बयान दिया है वह ऐसे ही लोगों को संबोधित करता है | जो बात गिरिराज सिंह कह रहें हैं वही बात सोनिया गाँधी के जीवनी लेखक पैट्रिक फ्रेंच ने भी कही है | लेकिन  भारतीय सभ्यता और संस्कृति में यह कहीं फिट नहीं बैठती,  भारत की सोच में श्याम रंग का भी उतना ही विशिष्ट स्थान है , भारत के सन्दर्भ में यह कोई मुद्दा ही नहीं हैं, क्योंकि जहाँ श्यामवर्ण के देव   श्रीकृष्ण    को भारतवर्ष  पूजता हो और जहा   श्यामवर्ण    के देवी देवताओं से भरी सभ्यता रही हो|


                                                                                                                     अश्वेत लोगों से भेदभाव का जो भयानक रूप यूरोप और पश्चिमी देशों में दीखता है, वैसा हमारे देश में कभी सोचा भी नहीं गया,  इसका हजारों वर्ष पुराना इतिहास        BBC     की हाल में चर्चा में रही   NIRBHAYA  documentry   की निर्माता       "लेसली उडविन "      ने शायद पढ़ा नहीं है, जो उन्होंने ये बयान  दिया की  "गिरिराज रेपिस्ट से कम नहीं है "  यह कहने से पहले उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और पूरी दुनिया में रंगभेद के जनक अपनी सभ्यता की मानसिकता को समझने की जरुरत है, लेकिन हमें भी ऐसी मानसिकता पर गर्व नहीं जिस से हम कही न कही छोटे रूप से भी ग्रसित हैं, तथा  जिसके उबरने  के लिए 60 वर्ष की अवधि पर्याप्त नहीं है | और आज तक हम उस से आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं | जिस  से मुक्ति पाने के लिए हमे गोरेपन का कायल नहीं बल्कि रंग की   pigmentocracy    की जड़ो को खोदना होगा|
                                                                                                                            दरअसल काले गोरे का विवाद नया नहीं है | यह रोग पूरी दुनिया में है , लाखों वर्षों तक सब ठीक-ठाक चलता रहा लेकिन जैसे ही लोगों की पहुँच एक से दुसरे महाद्वीप तक हुई तथा अलग रंगों के लोग एक दुसरे के समीप आये रंग के आधार पर भेद शुरू हो गया| दरअसल गोरेपन की मानसिकता से ग्रसित भारत    facecreame    के एक बड़े बाजार के रूप में भी उभरा और कंपनियों ने लोगों की इसी लालसा का व्यापर भी बखूबी किआ| और इसका सबसे सत्य तथ्य यह है,  की अमेरिकी या यूरोपीय बाजार के मुकाबले भारत का सौंदर्य प्रसाधन का बाजार दोगुनी तेजी के साथ बढ़ रहा है, त्वचा को गोरा बनाने का बाजार, उत्पादों के आलावा सौंदर्य के लिए शल्य चिकित्सा एवं अन्य सेवाओं को मिला दिया जाये तो यह 16 हजार करोड़ को पार कर गया है |
                                                                                 
       भारत में लोग गोरा होने की चाहत में इस हद तक फेयरनेस क्रीम का इस्तेमाल कर लेते हैं की कुदरती त्वचा से खिलवाड़ कर बैठते हैं, कोई कम्पनी यह दावा नहीं कर सकती की इन क्रीम के नकारात्मक असर नहीं है, और अब भारत में यह चाहत नशे का रूप ले चूका है | लेकिन सही अर्थो में कहें तो यह भेदभाव हमारे सभ्यता की निशानी कभी नहीं रही है |तथा इसका पोषण यूरोपीय लोगों ने किआ है तथा यह कहा भी गया की गोरे आदमी की यह जिम्मेदारी है की वह काले लोगों को सभ्य बनाये जिसे " व्हाइट मैन बर्डन" का नाम दिया , हमारे यहाँ रंगभेद ने कभी इस तरह का जहरीला रूप नहीं लिया , भारत को जरुरत है की ऐसी मानसिकता की रति भर भी गुंजाईश नहीं हो क्युकी यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में सही कदम होगा न की     "my choice "
तो बताइए क्या है आपकी choice आप अपनी choice से जीना चाहती हैं की दीपिका की choice से ........................................................................................................

Friday, April 3, 2015

aam aadmi ya aam(mango) hai aadmi

क्या आदमी    "आम"  है,  या  आम (mango) है ?

कुछ दिनों से सबसे ज्यादा चर्चा में अगर कोई विषय है|   तो वह है , "आम आदमी" | भारत में चुनावों  की राजनीती में अगर कोई विषय सबसे ज्यादा लोक लुभावन  है,  वह है ,  "आम आदमी" और अगर कोई सबसे ज्यादा  पिसता आया है , तो वह है,  "आम आदमी" और सबसे ज्यादा कोई आहत  हुआ है,  वह है , "आम आदमी"
              ....पर आश्चर्य की बात है उसी  "आम आदमी"   ने राष्ट्र के निर्माण में अपना संपूर्ण  योगदान दिया है | और इस सोने की चिड़िया का शिल्पकार भी वही है | कुछ महीनो पूर्व एक संत की  भयानक चेहरे सामने आने से लोगो की आस्था को चोट पहुंची थी |  कही न कही राजनीती में लोगो के चेहरे जब चुनावो के पांच सालो बाद लोगो के सामने आते हैं तो लोगो की राजनीती की आस्था भी ठीक वैसे ही डगमगा जाती है,   परन्तु पांच साल बाद फिर वही समय बार- बार सामने आकर खड़ा हो कर चिढाता है| और  बार-बार वही चीजे दोहराई जाती हैं |और हर बार  राजनितिक किरदार बदल जाते हैं, और  नए-नए चेहरे सामने आते हैं | पर राजनीती और अविश्वास  नए - नए  कीर्तिमान स्थापित करती  चली जाती है,  और लोग मूकदर्शक बनकर  बेबस देखते रहते हैं | पर कर कुछ नहीं पाते |
                                    दल- बदल"  कानून आया था,  लेकिन उसके निर्माताओ ने भी नहीं सोचा होगा की अगर कोई केजरीवाल के कहे अनुसार 67 के 67 विधायक लेकर पार्टी ही छोड़कर अलग सिर्फ सरकार लेकर  हो जाएँ तो पार्टी के नाम पर और उन विचारो के नाम पर जिन लोगो ने वोट दिया वह आदमी आम है या  आम (mango)  है| 

                                                      इस सवाल का जवाब न तो केजरीवाल के पास हो सकता है ना ही भारत के चुनावी नियम कायदे इसका जवाब दे सकते है|  दरअसल इसकी जरुरत भी नहीं है, क्युकी लोगो ने कभी इसकी जरुरत महसूस ही नहीं की, क्युकी भारत के लोग सिर्फ कर्त्तव्य करना जानते हैं फल की इच्छा वह नहीं करते और भारत की हजारों साल पुराणी संस्कृति उन्हें यही शिक्षा देती है | लेकिन वह नहीं जानते की यह शिक्षा रामराज्य के लिए उपयोगी थी, जहाँ अपने राज्य के एक आम आदमी के शंका के  लिए राजा अपनी पत्नी तक को त्याग देता है | उन राज्यों (रामराज्य ) में आदमी आम होता था | आज आदमी सरकारों के लिए आम (mango ) है , जिसे चुस लेना या कहे उनका शोषण कर लेना सरकार का जन्मसिद्ध अधिकार है |  
                                                                                                                                             

                                                               वास्तव में  इस देश में सरकारें कभी  "आम आदमी"  की जबाबदेह रही ही नहीं है|   इसका एक लम्बा इतिहास इस देश के  "आम आदमी"  ने देखा है | और सहा भी है,  और सिर्फ एक संतोष के सहारे हर वह  "आम आदमी"  जी रहा है ,की वह उस विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का हिस्सा है ,जो उसके सहारे चुनी जाती है, और बार-बार वही सत्ताधारी  लोग जब सतासीन हो जाते हैं,    तो  "आदमी"  को सरकारें   "आम (mango )"   समझ लेती है और हर सरकार का शासन जब पांच साल बाद इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है की वह अपनी विवेक का उपयोग कर सरकार चुने तो वह आदमी सिर्फ गुठली के रूप में बच जाता है और इतना   confuse   की वह समझ नहीं पाता की वह किसे चुने क्युकी चुनना तो किसी न किसी को है ही
|
                                                                                                             तो फिर जो नए कलेवर में कुछ लोग इस बार आये थे जिसे देखकर इस बार दिल्ली confuse हो गई और जो अन्ना "राईट टू रिजेक्ट"  की बात करते हैं|  उनके इस स्वप्न को ठेंगा उनके ही कृपापात्र  ने दिखाया तब सबसे पहले सवाल उठा की जो आदमी अपने लिए जिए उसके साथ तो विस्वासघात तो हो सकता है|  लेकिन जो दुसरो के लिए जीता था|  उसके पैरो तले जमीं खिसकाने वाले पर दिल्ली वालो को इतना विस्वास कैसे हो गया भरोसा तो टूटना था | टुटा और शायद अन्ना की हाय लग ही गई इसमें इस बार जो आदमी अपने आप को  "आम (mango )"  समझ रहा है,,, वह है ,दिल्ली का  "आम आदमी"  दरअसल केजरीवाल की लात  दिल्ली वालो के विस्वास पर पड़ी है, और अगले पांच साल तक वह मूकदर्शक बनकर सिर्फ देख सकता है | कर कुछ नहीं सकता क्युकी कोई भी पार्टी यह चाहेगी नहीं की   "राईट टू रिजेक्ट"   जैसा कोई कानून बने तो फिर अभी जनता को  "आम (mango )"  बना रहना होगा और हर पांच साल में उसके हर डालो पे विस्वास और आशा  की सिर्फ     गुठली     मिलने वाली है |