Friday, April 3, 2015

aam aadmi ya aam(mango) hai aadmi

क्या आदमी    "आम"  है,  या  आम (mango) है ?

कुछ दिनों से सबसे ज्यादा चर्चा में अगर कोई विषय है|   तो वह है , "आम आदमी" | भारत में चुनावों  की राजनीती में अगर कोई विषय सबसे ज्यादा लोक लुभावन  है,  वह है ,  "आम आदमी" और अगर कोई सबसे ज्यादा  पिसता आया है , तो वह है,  "आम आदमी" और सबसे ज्यादा कोई आहत  हुआ है,  वह है , "आम आदमी"
              ....पर आश्चर्य की बात है उसी  "आम आदमी"   ने राष्ट्र के निर्माण में अपना संपूर्ण  योगदान दिया है | और इस सोने की चिड़िया का शिल्पकार भी वही है | कुछ महीनो पूर्व एक संत की  भयानक चेहरे सामने आने से लोगो की आस्था को चोट पहुंची थी |  कही न कही राजनीती में लोगो के चेहरे जब चुनावो के पांच सालो बाद लोगो के सामने आते हैं तो लोगो की राजनीती की आस्था भी ठीक वैसे ही डगमगा जाती है,   परन्तु पांच साल बाद फिर वही समय बार- बार सामने आकर खड़ा हो कर चिढाता है| और  बार-बार वही चीजे दोहराई जाती हैं |और हर बार  राजनितिक किरदार बदल जाते हैं, और  नए-नए चेहरे सामने आते हैं | पर राजनीती और अविश्वास  नए - नए  कीर्तिमान स्थापित करती  चली जाती है,  और लोग मूकदर्शक बनकर  बेबस देखते रहते हैं | पर कर कुछ नहीं पाते |
                                    दल- बदल"  कानून आया था,  लेकिन उसके निर्माताओ ने भी नहीं सोचा होगा की अगर कोई केजरीवाल के कहे अनुसार 67 के 67 विधायक लेकर पार्टी ही छोड़कर अलग सिर्फ सरकार लेकर  हो जाएँ तो पार्टी के नाम पर और उन विचारो के नाम पर जिन लोगो ने वोट दिया वह आदमी आम है या  आम (mango)  है| 

                                                      इस सवाल का जवाब न तो केजरीवाल के पास हो सकता है ना ही भारत के चुनावी नियम कायदे इसका जवाब दे सकते है|  दरअसल इसकी जरुरत भी नहीं है, क्युकी लोगो ने कभी इसकी जरुरत महसूस ही नहीं की, क्युकी भारत के लोग सिर्फ कर्त्तव्य करना जानते हैं फल की इच्छा वह नहीं करते और भारत की हजारों साल पुराणी संस्कृति उन्हें यही शिक्षा देती है | लेकिन वह नहीं जानते की यह शिक्षा रामराज्य के लिए उपयोगी थी, जहाँ अपने राज्य के एक आम आदमी के शंका के  लिए राजा अपनी पत्नी तक को त्याग देता है | उन राज्यों (रामराज्य ) में आदमी आम होता था | आज आदमी सरकारों के लिए आम (mango ) है , जिसे चुस लेना या कहे उनका शोषण कर लेना सरकार का जन्मसिद्ध अधिकार है |  
                                                                                                                                             

                                                               वास्तव में  इस देश में सरकारें कभी  "आम आदमी"  की जबाबदेह रही ही नहीं है|   इसका एक लम्बा इतिहास इस देश के  "आम आदमी"  ने देखा है | और सहा भी है,  और सिर्फ एक संतोष के सहारे हर वह  "आम आदमी"  जी रहा है ,की वह उस विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का हिस्सा है ,जो उसके सहारे चुनी जाती है, और बार-बार वही सत्ताधारी  लोग जब सतासीन हो जाते हैं,    तो  "आदमी"  को सरकारें   "आम (mango )"   समझ लेती है और हर सरकार का शासन जब पांच साल बाद इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है की वह अपनी विवेक का उपयोग कर सरकार चुने तो वह आदमी सिर्फ गुठली के रूप में बच जाता है और इतना   confuse   की वह समझ नहीं पाता की वह किसे चुने क्युकी चुनना तो किसी न किसी को है ही
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                                                                                                             तो फिर जो नए कलेवर में कुछ लोग इस बार आये थे जिसे देखकर इस बार दिल्ली confuse हो गई और जो अन्ना "राईट टू रिजेक्ट"  की बात करते हैं|  उनके इस स्वप्न को ठेंगा उनके ही कृपापात्र  ने दिखाया तब सबसे पहले सवाल उठा की जो आदमी अपने लिए जिए उसके साथ तो विस्वासघात तो हो सकता है|  लेकिन जो दुसरो के लिए जीता था|  उसके पैरो तले जमीं खिसकाने वाले पर दिल्ली वालो को इतना विस्वास कैसे हो गया भरोसा तो टूटना था | टुटा और शायद अन्ना की हाय लग ही गई इसमें इस बार जो आदमी अपने आप को  "आम (mango )"  समझ रहा है,,, वह है ,दिल्ली का  "आम आदमी"  दरअसल केजरीवाल की लात  दिल्ली वालो के विस्वास पर पड़ी है, और अगले पांच साल तक वह मूकदर्शक बनकर सिर्फ देख सकता है | कर कुछ नहीं सकता क्युकी कोई भी पार्टी यह चाहेगी नहीं की   "राईट टू रिजेक्ट"   जैसा कोई कानून बने तो फिर अभी जनता को  "आम (mango )"  बना रहना होगा और हर पांच साल में उसके हर डालो पे विस्वास और आशा  की सिर्फ     गुठली     मिलने वाली है | 

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