रंगवाद Vs "My Choice"
गिरिराज सिंह माननीय मंत्री जी .........के कहे गए कुछ शब्दों ने कुछ लोगो को गहरे तक झकझोर कर रख दिया है | जिसमे गोरे और काले जिसे रंगभेद या नए शब्दों में रंगवाद कह सकते हैं | की परिभाषा गढ़ने का काम किआ इसमें माननीय मंत्री जी की कोई गलती नहीं है | दरअसल वर्षो तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े-जकड़े कहीं न कहीं हमारी मानसिकता तक को अंग्रेजियत ने गुलाम बना रखा है| इसलिए भारतीय भी गोरी चमड़ी के पीछे कुछ ज्यादा ही भागने लगे हैं| विशेषकर यूरोपीय गोरी चमड़ी के पीछे पर इसे भारतीय सोच का नाम नहीं दिया जाना चाहिए | माननीय मंत्री गिरिराज सिंह ने जो बयान दिया है वह ऐसे ही लोगों को संबोधित करता है | जो बात गिरिराज सिंह कह रहें हैं वही बात सोनिया गाँधी के जीवनी लेखक पैट्रिक फ्रेंच ने भी कही है | लेकिन भारतीय सभ्यता और संस्कृति में यह कहीं फिट नहीं बैठती, भारत की सोच में श्याम रंग का भी उतना ही विशिष्ट स्थान है , भारत के सन्दर्भ में यह कोई मुद्दा ही नहीं हैं, क्योंकि जहाँ श्यामवर्ण के देव श्रीकृष्ण को भारतवर्ष पूजता हो और जहा श्यामवर्ण के देवी देवताओं से भरी सभ्यता रही हो|
अश्वेत लोगों से भेदभाव का जो भयानक रूप यूरोप और पश्चिमी देशों में दीखता है, वैसा हमारे देश में कभी सोचा भी नहीं गया, इसका हजारों वर्ष पुराना इतिहास BBC की हाल में चर्चा में रही NIRBHAYA documentry की निर्माता "लेसली उडविन " ने शायद पढ़ा नहीं है, जो उन्होंने ये बयान दिया की "गिरिराज रेपिस्ट से कम नहीं है " यह कहने से पहले उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और पूरी दुनिया में रंगभेद के जनक अपनी सभ्यता की मानसिकता को समझने की जरुरत है, लेकिन हमें भी ऐसी मानसिकता पर गर्व नहीं जिस से हम कही न कही छोटे रूप से भी ग्रसित हैं, तथा जिसके उबरने के लिए 60 वर्ष की अवधि पर्याप्त नहीं है | और आज तक हम उस से आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं | जिस से मुक्ति पाने के लिए हमे गोरेपन का कायल नहीं बल्कि रंग की pigmentocracy की जड़ो को खोदना होगा|
दरअसल काले गोरे का विवाद नया नहीं है | यह रोग पूरी दुनिया में है , लाखों वर्षों तक सब ठीक-ठाक चलता रहा लेकिन जैसे ही लोगों की पहुँच एक से दुसरे महाद्वीप तक हुई तथा अलग रंगों के लोग एक दुसरे के समीप आये रंग के आधार पर भेद शुरू हो गया| दरअसल गोरेपन की मानसिकता से ग्रसित भारत facecreame के एक बड़े बाजार के रूप में भी उभरा और कंपनियों ने लोगों की इसी लालसा का व्यापर भी बखूबी किआ| और इसका सबसे सत्य तथ्य यह है, की अमेरिकी या यूरोपीय बाजार के मुकाबले भारत का सौंदर्य प्रसाधन का बाजार दोगुनी तेजी के साथ बढ़ रहा है, त्वचा को गोरा बनाने का बाजार, उत्पादों के आलावा सौंदर्य के लिए शल्य चिकित्सा एवं अन्य सेवाओं को मिला दिया जाये तो यह 16 हजार करोड़ को पार कर गया है |
भारत में लोग गोरा होने की चाहत में इस हद तक फेयरनेस क्रीम का इस्तेमाल कर लेते हैं की कुदरती त्वचा से खिलवाड़ कर बैठते हैं, कोई कम्पनी यह दावा नहीं कर सकती की इन क्रीम के नकारात्मक असर नहीं है, और अब भारत में यह चाहत नशे का रूप ले चूका है | लेकिन सही अर्थो में कहें तो यह भेदभाव हमारे सभ्यता की निशानी कभी नहीं रही है |तथा इसका पोषण यूरोपीय लोगों ने किआ है तथा यह कहा भी गया की गोरे आदमी की यह जिम्मेदारी है की वह काले लोगों को सभ्य बनाये जिसे " व्हाइट मैन बर्डन" का नाम दिया , हमारे यहाँ रंगभेद ने कभी इस तरह का जहरीला रूप नहीं लिया , भारत को जरुरत है की ऐसी मानसिकता की रति भर भी गुंजाईश नहीं हो क्युकी यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में सही कदम होगा न की "my choice "
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