महिला सशक्तिकरण ?, sex की आजादी या बराबरी का अधिकार
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| किरण शेखावत |
लेफ्टिनेंट किरण शेखावत छोकर सिर्फ ससुराल ही नहीं पुरे मेवात की अब पहचान हैं | आनर किलिंग के लिए बदनाम हरियाणा में इस आदर से पुरुष प्रधान समाज में एक महिला का नाम आते ही पुरुषों के होंठ भी बंद हो जातें है , जिस गाँव को लोग जानते भी नहीं थे उस कुर्थला गाँव की पहचान अब किरण शेखावत के नाम से है |
Woman Empowerment के लिए इस से ससक्त उदहारण कोई हो नहीं सकता | तो सवाल यहीं से खड़ा होता है की क्या भारत में नारी सशक्तिकरण का मतलब सिर्फ सेक्सुअलिटी से जुदा है? क्या इस से आगे उनकी स्वतंत्रता का कोई निहितार्थ नहीं है? क्या सिर्फ सेक्स की स्वतंत्रता और उस से जुड़े मुद्दों पर महिलाओं की आजादी देकर क्या पुरुष वर्ग समाज के मूल निहितार्थ तथा सामाजिक सरोकारों के सभी दायित्वों को निभाए ,अगर ऐसा होगा तो क्या यह देश कभी सशक्त होगा ? जवाब है नहीं, क्योकि महिला सशक्तिकरण के नाम पर जिन मुद्दों को लोग अपने स्वार्थ सीधी के लिए उठा रहें हैं वह उनकी वास्तविक आजादी में सिर्फ 1 प्रतिशत का योगदान रखती हैं| वास्तव में दीपिका पादुकोण और होमी इन दोनों ने woman empowerment में से सिर्फ उन्ही विषयों को चुना है जो वास्तव में उनके व्यवसाय से जुड़े हैं, तथा ये मुद्दे जितना ज्यादा उछलेंगे उतनी ही प्रसिधी तथा उनका बाजारीकरण होगा और इस बाजारीकरण के अपने इसी आईडिया से आज दीपिका पादुकोण बॉलीवुड की टॉप अभिनेत्रियों में शुमार हैं जहाँ पुरुषों में यह ताज आमिर खान के नाम सजता है|
भारत में हमेशा से आदर्श चुनने के ज्ञान का टोटा रहा है, और सबसे ज्यादा पशोपेश में युवा वर्ग रहता है, इसी का फायदा देश में ग्लैमर, बॉलीवुड और राजनितिक क्षेत्र के लोग उठाते रहें हैं| इस देश में महिला सशक्तिकरण के प्रतिमान जिन महिलाओ ने स्थापित किये वह उनका प्रचार और व्यापर नहीं कर पाए इस लिए वह आज हमारे देश के महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती लेकिन कुछ लोग उनके मुद्दों को भुनाकर प्रचार भी कर रहें हैं और व्यापर भी और बॉलीवुड किसी भी मुद्दे का बाजारीकरण करने में महारथ रखता है| और इसी दुखती रग को बॉलीवुड परख चूका है की भारत ही ऐसा बाजार है जहाँ लोग रोजमर्रा से जुडी चीजों से लेकर जीवन के आयाम को अपनाते हुआ सिर्फ packing (बाहरी आवरण) को महत्व देते हैं| न की मूल तत्व को, जिस देश में युवा सलमान को तो लाखो की संख्या में जन्मदिन की बधाई भेजता है, लेकिन गाँधी के उपदेश गाँधी जयंती को हि भुला देता है, ऐसे देश में आदर्शों की नहीं चकाचोंध की कीमत लगाई जाती है| और उस खांचे में दीपिका पादुकोण बिलकुल फिट बैठती हैं |
तो सवाल यहीं से खड़ा होता हैं की महिला सशक्तिकरण का मुद्दा परदे पर उकरने की कला तो बॉलीवुड बखूबी जानता है| लेकिन 100 वर्षों के इतिहास में कोई सरोजिनी या इंदिरा, मदर टेरेसा , या फिर किरण शेखावत ,हजारों ऐसे नाम जो अब हमारे बिच नहीं हैं | तथा कुछ ऐसे नाम जो हमारे बिच हैं | ललिता गुप्ते (आईसीआईसीआई बैंक की पूर्व जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर ), इंदिरा नुई (पेप्सी ), मेधा पाटकर , अरुणा रॉय, इरोम शर्मीला, सोनिया गाँधी , किरण बेदी , बनकर महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को सचमुच सजीव करने के लिए खड़ा नहीं हुआ बॉलीवुड ने भारत के हर संवेदनशील मुद्दे का सिर्फ बाजारीकरण किआ है| वर्तमान में दीपिका पादुकोण का पुरजोर समर्थन कर रहे ऋषि कपूर की पीढियों ने वास्तव में महिलाओ को एक वस्तु के रूप में पेश किआ जिस से राजकपूर को the great showman का ख़िताब दिलवाया और वर्तमान में करीना कपूर गाने में महिलाओ को तंदूरी मुर्गी बताती हैं, तो यही सोच महिलाओं के सशक्तिकरण में सबसे बड़ी बाधा है
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| दबंग 2 में करीना कपूर गाना - फविकोल से |
तो युवाओ आज आपको चुनना होगा की आप इरोम शर्मीला या किरण शेखावत को अपना आदर्श मानती हैं या फिर दीपिका पादुकोण, नंदिता दास (जिनको हर भारतीय पुरुष रेपिस्ट दीखता है ) या सनी लियोन, को
कहीं न कही सामाजिक बन्धनों का सवाल है तो भारतीय सभ्यता में महिला और पुरुषो को बराबर अधिकार मिले हैं| हाँ अपनी पुरुषवादी सोच के कारण इस में पुरुषों ने अपनी सीमाओं का उलंघन किया है| और इसे सुधारने की दिशा में पहल किया जाना चाहिए न की उसी राह पर चलकर उनके किये गए कार्यो को हम पुरुषो की सशक्तिकरण का नाम देने दें, तब न तो उन्हें पछतावा होगा न ही हम उन्हें गलत कहने के अधिकारी होंगे, तो सवाल महिलाओं को ही पूछना होगा की क्या सेक्सुअलिटी की आजादी से ही हमे वास्तविक अधिकार मिल जायेंगे ?
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